“प्रेम का बीज”
अगर एक बीज सही जगह गिर जाए,
तो वह स्वयं ही अंकुरित हो जाता है।
धीरे-धीरे वह एक वृक्ष बनता है —
प्रकृति उसे अपने आँचल में पालती है।
फिर वह यह नहीं देखती कि
वह बाग़ में है, जंगल में है, या किसी नाले के किनारे।
प्रेम भी एक ऐसा ही बीज है।
जब कोई इंसान प्रेम में होता है,
तो वह जगह नहीं देखता, समाज नहीं देखता —
वह बस इंसान देखता है।
एक-दूसरे के प्रति समर्पण और भावनाएँ ही
उसके लिए सारी दुनिया बन जाती हैं।