अकड़ और संस्कार
एक दुकानदार था जिसे अपने व्यापार पर बहुत घमंड था।
दुकान पर जो भी ग्राहक आता, वह उनसे अकड़ भरे लहज़े में ही बात करता।
एक दिन एक बुज़ुर्ग उसकी दुकान पर आए। दुकानदार ने उनसे भी उसी अकड़ में बात की।
बुज़ुर्ग ने सामान तो ले लिया, लेकिन जाते-जाते हँसकर बोले—
“अरे साहब! इतनी अकड़ लेकर कहाँ जाओगे?”
दुकानदार उस दिन मज़ाक़ के मूड में था। उसने भी मुस्कुराते हुए कहा—
“कहाँ साहब! हम तो ये सारी अकड़ अपने बच्चों को देकर जाएँगे।”
समय बीता। कुछ सालों बाद दुकानदार की मृत्यु हो गई।
और चंद महीनों में ही वह दुकान भी बंद हो गई—
वही दुकान, जिसे उसने बरसों की मेहनत से खड़ा किया था।
क्योंकि उसने अपने बच्चों को मेहनत तो सिखाई ही नहीं,
बस सब कुछ बना-बनाया देकर चला गया।
और जहाँ मेहनत की आदत न हो, वहाँ विरासत ज़्यादा देर नहीं टिकती।
सीख
बच्चों को संपत्ति ही नहीं, मेहनत और संस्कार भी सिखाना ज़रूरी है।
क्योंकि अकड़ से नहीं, मेहनत और संस्कार से ही घर और व्यापार टिकते हैं।