डर या फ़ैसले
कभी-कभी कुछ फैसले
हम अपनी चाहत से नहीं,
अपने डर की वजह से कर लेते हैं…
और फिर उसी डर की कीमत
हमें आज नहीं तो कल
ज़रूर चुकानी पड़ती है।
डर कहता है—
“मत बढ़ो, कहीं हार गए तो?”
और ज़िंदगी पूछती है—
“अगर कोशिश ही नहीं की,
तो जीतोगे कैसे?”
इसलिए अगली बार
जब कोई फैसला लेना हो,
तो पहले अपने डर को किनारे रखना…
क्योंकि डर के साथ लिया गया फैसला
शायद तुम्हें सुरक्षित रखे,
लेकिन तुम्हें वहाँ नहीं ले जाएगा
जहाँ तुम सच में पहुँचना चाहते हो।
डर को छोड़कर फैसला लेना…
क्योंकि ज़िंदगी में पछतावा
अक्सर हारने से नहीं,
कोशिश न करने से होता है। ✨