“समय और मैं”

“समय हर समय एक-सा नहीं रहता,
किसी के लिए नहीं… मेरे लिए भी नहीं।
कभी था मैं वैसा, जैसा सबको भाता,
अब बदल गया हूँ — शायद ज़रूरत थी यही।

बदला हुआ इंसान ख़त्म नहीं होता,
वो बस एक नया रूप लेकर जीता है,
बीते हुए कल की धूल झाड़कर,
आने वाले कल की रोशनी सींचता है।

बीता हुआ कल लौटकर नहीं आता,
पर वो एक आने वाला कल बना जाता है,
हर टूटन में एक सीख छोड़ जाता है,
हर अंत में एक नया आरंभ सजा जाता है।

समय बदलता है — और हम भी,
क्योंकि ठहराव में नहीं है ज़िंदगी की रीत।
जो कल था, वो अब नहीं;h
पर जो आने वाला है, वही सच्ची जीत।

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