लोग आते हैं,फिर चले जाते हैं।

लोग आते हैं,
फिर चले जाते हैं।

धीरे-धीरे
वक़्त मोह, प्रेम, मृत्यु
सभी को पीछे ले जाता है।

हमसे कहते हैं—
“ज़िंदगी छोटी है, खुश रहो।”
पर हम अपने उसूल
कहां छोड़ पाते हैं?

हम उन्हीं उसूलों में
इतना डूब जाते हैं
कि खुशियों का रास्ता
याद ही नहीं रहता।

रह जाता है बस—
सम्मान,
अहंकार,
और समाज को दिखाने के लिए
दौलत का बोझ।

ज़िंदगी तो लंबी है,
बस हम उसे छोटा कर देते हैं।

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