पहाड़ और नदी

पहाड़ खड़ा था सदियों से,
थोड़ा शांत… थोड़ा गंभीर।
चोटियों पर बर्फ़ थी,
पर दिल में एक इंतज़ार धीर-धीरे जलता था।

नदी दूर कहीं से बहकर आती,
हवाओं में हँसी बिखेरती,
पत्थरों से खेलती,
और पहाड़ के पैरों में हरियाली उगा जाती।

वो आती तो पहाड़ की रूह तक महक जाती,
और जाती तो उसके दिल में
थोड़ी-सी नमी छोड़ जाती।

नदी ने कभी रुकना नहीं सीखा—
वो चलना चाहती थी, बहना चाहती थी,
क्योंकि रुक जाती…
तो नदी नहीं रहती।

और पहाड़ ने कभी कहना नहीं सीखा—
“रुक जाओ”
“या मैं तुमसे प्यार करता हूँ”
क्योंकि वो जानता था—
प्यार बाँधने से नहीं,
आज़ाद करने से ज़िंदा रहता है।

हर साल नदी लौटकर आती,
हर बार पहाड़ मुस्कुराकर उठता।
उसका लौट आना ही उसका इकरार था,
और पहाड़ का इंतज़ार
उसका सबसे सच्चा प्यार।

कहा नहीं गया,
लिखा नहीं गया,
पर उनके बीच
एक अनकही मोहब्बत थी।

नदी हर बार बहकर आगे बढ़ती रही—
पर पहाड़ के पास
अपना पहला ठिकाना छोड़ती रही।

कभी-कभी…
प्रेम ऐसा भी होता है—
पूरा नहीं,
फिर भी कम नहीं।

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