त्याग का अंत





उसने त्याग किया…
घर और परिवार की खुशियों के लिए।
पर कौन जानता था—
वो त्याग, त्याग नहीं,
उसकी अपनी खुशियों की मृत्यु थी।

उसके बलिदान का कहीं शोर नहीं,
किसी दीवार ने उसकी चुप्पी नहीं सुनी,
क्योंकि सब व्यस्त थे—
अपने-अपने उत्सवों में।

किसी को खुशी थी—
घर में दीप सजेंगे,
शहनाइयाँ गूंजेंगी…

किसी को खुशी थी—
उसके नाम पर नए वस्त्र आएंगे,
नए रंग, नई साड़ियों की खुशबू घर भर देगी…

किसी को खुशी थी—
उसके लिए नए रास्ते खुलेंगे,
नए नाम, नए ठिकाने मिलेंगे…

किसी को खुशी थी—
घर में नए रिश्ते जुड़ेंगे,
नई बातचीत, नए चेहरे मुस्कुराएँगे…

कोई अपनी जिम्मेदारी निभा लेने में खुश था,
तो कोई समाज के सवालों और तानों से
मुक्त होने पर।

हर किसी के पास
खुश होने की एक वजह थी—
सिवाय उसके।

क्योंकि उसकी खुशी
इन सबकी खुशियों में थी।

इसीलिए उसने
अपनी इच्छाओं को चिता दी—
और मुस्कुराकर
अपनी खुशियों की मृत्यु चुन ली।

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